आधुनिकता की चकाचौंध में खो गई कुम्हारों की कारीगरी..

अब नही दिखते कुम्हार की घूमती चाक, पुश्तैनी कार्य छोड़ने को मजबूर कुम्हार

लखनऊ सुपरफास्ट संवाददाता सुचीत प्रताप सिंह
अमीरनगर खीरी।
दीपावली में कुम्हारों के घर की दीवाली फीकी नजर आती है। दीपावाली में कुम्हारों की कारीगरी को चाइनीज झालरों तथा चायनीज दीपको ने धवस्त कर दिया है। चाइना के रेडीमेड दीपक और क्राकरी ने कुम्हारों की रोजी रोटी पर झपट्टा मार दिया है। प्रकाश के पर्व दीपावली पर कुम्हारो की चाक की रफ्तार मानो कुंद सी पड़ गई है। कुम्हारों के परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। बहुत से कारीगर अपने पुश्तैनी काम को अलविदा भी कह चुके हैं ।प्राचीन समय से चला आ रहा कुम्हारों का दीपक तथा मटको का धंधा आज आधुनिकता की चकाचौंध में खो कर रह गया है। आज कैंपर, वाटर कूलर,और फ्रिजो के बढ़ते प्रचलन के कारण कुम्हारों का धंधा चौपट हो गया है। मिट्टी के बर्तनों की मांग न होने के कारण अब कुम्हार समुदाय के लोग इस धंधे से तौबा कर अन्य धंधा को अपनाने को मजबूर हो गए हैं। गौरतलब है कि प्राचीन समय में ग्रामीण व शहरी क्षेत्र में मिट्टी के बने बर्तनों का बहुत ही अधिक उपयोग किया जाता था गर्मी शुरू होने से पूर्व भी कुम्हार समुदाय के लोग बड़े पैमाने पर मटको का निर्माण करते थे तथा पूरा परिवार मटके तथा अन्य मिट्टी के बर्तन बनाने में लगा रहता था और मटको से वह अपना पूरे वर्ष का खर्चा चलाते थे। आधुनिकता की चकाचौंध ने कुम्हार समुदाय के व्यवसाय पर ग्रहण लगा दिया है। दीपावली के इस त्यौहार में भी कुम्हार समुदाय के लोग चाइनीज झालरों तथा दीपको ने उनकी दिवाली के हर्ष उल्लास को फीका कर दिया है। फलस्वरूप इस समुदाय के लोग पुश्तैनी व्यवसाय को छोड़कर अन्य व्यवसाय में व्यस्त हो गए हैं।

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