मेड इन इंडिया के दावे को सार्थक करता उद्योगों के लिए वरदान ग्रीन कार्बन का कमाल

लखनऊ सुपरफास्ट

 जीसी यानी ग्रीन कार्बन के प्रयोग का सीधा मतलब कोयले की खपत , खरीद, परिवहन, और हैंडलिंग प्रक्रियाओं पर अभूतपूर्व बचत के साथ ही राख निपटान, बिजली संयंत्रों के परिचालन और पर्यावरण इंजीनियरिंग की लागत में भी भारी कमी
जीसी के प्रयोग से हर राज्य को भी होगी भारी कमाई, साथ ही हजारों को मिलेगा रोजगार
 जीसी की तकनीक को चीन को कदापि साझा नहीं करने की लिखित गारंटी देने वाली अमेरिकी कंपनी प्रयोग के बदले राज्य सरकारों से नहीं लेगी प्रति बॉयलर शुल्क, केवल प्रति किलोवाट बचत पर ही होगी राजस्व हिस्सेदारी

नई दिल्ली। विश्व गुरु बनने के पथ पर निरंतर गतिवान भारत देश दुनिया के हित में नए-नए प्रयोगों की सफलता का भी प्रतीक बनने में पीछे नहीं है। उद्योग जगत के हित में लागत में बचत के मामले में इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ,जीसी यानी ग्रीन कार्बन का प्रयोग, जिसका संबंध उद्योगों के बॉयलर आदि में प्रयोग किए जाने वाले कोयले से है।
यहां जीसी यानी ग्रीन कार्बन के प्रयोग का सीधा मतलब है ,कोयले की खपत , खरीद, परिवहन, और हैंडलिंग प्रक्रियाओं पर अभूतपूर्व बचत के साथ ही राख निपटान, बिजली संयंत्रों के परिचालन और पर्यावरण इंजीनियरिंग की लागत में भी भारी कमी की अभूतपूर्व गारंटी, जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेड इन इंडिया” के नारे और दावे को वास्तविकता के धरातल सार्थक भी करती है।
जीसी यानी ग्रीन कार्बन के प्रयोग के संदर्भ में आर्थिक लाभ को लेकर अब तक जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक ऐसा इसलिए संभव है, क्योंकि कोयला इनपुट की मात्रा बहुत कम हो जाएगी। चूंकि CO2, SOX और NOX बहुत कम हो जाएंगे, जिसके फल स्वरुप
न केवल “मेड इन इंडिया” को व्यापक रूप मिलेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की स्थिति लाभप्रद होने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती ,क्योंकि कार्बन क्रेडिट से देश के हर राज्य को भारी कमाई होगी, जिसकी वजह बनेगी कम बिजली दरों से उद्योगों के लिए उत्पादन लागत में कमी, जिसका सीधा प्रभाव औद्योगिक स्पर्धा पर भी पड़ेगा। मतलब हर भारतीय उद्योग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बन जाएगा जो भारत को नया मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के रूप में बेरोजगारों के लिए भारी संख्या में रोजगार देने की भी मजबूत वजह बनेगा।
एक महत्वपूर्ण सवाल यहां जीसी के शुल्क को लेकर भी उठता है। इसमें भी आर्थिक लाभ का दृष्टिकोण बिल्कुल साफ नजर आता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर जीसी का प्रयोग किया जाता है तो इसके बदले अमेरिकी कंपनी राज्य सरकार से प्रति बॉयलर शुल्क नहीं लेगी। वह पारस्परिक रूप से तय शर्तों पर बॉयलर के जीवन के लिए प्रति किलोवाट, राज्य सरकार द्वारा बचत पर केवल राजस्व हिस्सेदारी पर ही होगी।
अब जहां तक जीसी यानी ग्रीन कार्बन की तकनीक को किसी अन्य के साथ साझा किए जाने जैसी आशंका और संभावना का सवाल है। ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला, क्योंकि इसकी मालिक निर्माता अमेरिकी कंपनी ग्रीन कार्बन (जीसी ) तकनीक को चीन के साथ साझा नहीं किए जाने की लिखित गारंटी पहले ही दे चुकी है।
अब यहां पर प्रयोग किए जाने पर हर दृष्टिकोण से लाभदायक जीसी की प्रक्रिया के बारे में भी जिज्ञासा भी पैदा होना स्वाभाविक है। इसका वैज्ञानिक पक्ष जिस आशय की जानकारी देता है ,उसके मुताबिक (जी.सी.) प्रक्रिया में एक बार तैयार होने वाले तत्वों को साधारण पानी (98% तक) में रखा जाता है और ईंधन स्रोत तक पहुंचाया जाता है।
दरअसल ग्रीन कार्बन (जी.सी.) मिश्रण गैर विषैला और गैर-ज्वलनशील पदार्थ है ,जिसके अभ्यास और उपयोग से पता चला है कि एक मानक दहन लिफाफे में थोड़ी मात्रा में ग्रीन कार्बन (जी.सी.) सामग्री रखने से एक नया थर्मल कैटेलिसिस शुरू हो जाएगा। ग्रीन कार्बन (जी.सी.) के आवेदन के 25 दिनों के भीतर बॉयलरों में कोयले के इनपुट में कमी शुरू हो जाएगी।
इसकी कटौती की प्रक्रिया 90 दिनों तक जारी रहेगी और कटौती 40 फीसदी तक होगी। कुल मिलाकर कोयले को मिलने वाला सीसी यानी ग्रीन कार्बन का साथ न केवल भारत बल्कि विश्व के हर देश के उद्योग के लिए लागत में बचत को लेकर भारी आर्थिक लाभ का ऐसा अभूतपूर्व क्रांतिकारी सफल प्रयोग है ,जो दशा और दिशा बदलते हुए भारतीय उद्योगों के उज्जवल भविष्य की कामना को अवश्य ही पूर्ण करेगा। लेकिन इस दावे की सत्यता को परख वही पाएगा जो एक बार जीसी अपनाएगा। और जिस दिन भी इसका दायरा देशव्यापी हो जाएगा। उस दिन भारत औद्योगिक क्षेत्र का भी विश्व गुरु कहलाएगा।

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